भारत का न्यायिक तंत्र दुनिया के सबसे पुराने और व्यापक न्याय प्रणालियों में गिना जाता है। संविधान ने हर नागरिक को न्याय का अधिकार दिया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि न्याय की इस लंबी यात्रा में कई बार निर्दोष ही सबसे बड़ा पीड़ित बन जाता है।
झूठे और दुर्भावनापूर्ण मामलों का चलन आज किसी एक राज्य या एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा। आरोप लगना आसान है, लेकिन आरोप से मुक्त होना वर्षों की कानूनी लड़ाई मांगता है। अदालत में अंततः सच सामने आ भी जाए, तब तक एक निर्दोष व्यक्ति अपना समय, सम्मान, आज़ादी और कभी-कभी पूरा जीवन खो चुका होता है।
विष्णु तिवारी का मामला इसी कड़वी सच्चाई का प्रतीक बनकर सामने आता है। वर्षों तक जेल में रहने के बाद जब अदालत ने उन्हें निर्दोष करार दिया, तब यह सवाल और भी गहरा हो गया—
क्या न्याय सिर्फ फैसला सुनाने का नाम है, या समय पर न्याय भी उतना ही जरूरी है?
झूठे मामलों में फँसे व्यक्ति के लिए हर दिन सज़ा के समान होता है। जेल से रिहाई के बाद भी समाज में उसे वही नज़र नहीं मिलती, जो एक आज़ाद नागरिक को मिलनी चाहिए। न नौकरी वापस मिलती है, न खोया हुआ सम्मान।
यह भी सच है कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी केवल अदालतों की गलती नहीं है। जांच एजेंसियों की लापरवाही, राजनीतिक दबाव, झूठी गवाही, और कानून के दुरुपयोग—सब मिलकर इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं।
आज सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जहाँ
“निर्दोष साबित होने तक हर आरोपी अपराधी मान लिया जाता है।”
क्या झूठे केस दर्ज कराने वालों के लिए सख़्त जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
क्या निर्दोष साबित होने के बाद राज्य की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह पीड़ित को सम्मानजनक पुनर्वास और मुआवज़ा दे?
यदि न्याय में देरी होती रही, तो यह केवल न्यायिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय बन जाएगा। अब समय आ गया है कि न्याय व्यवस्था आत्ममंथन करे—ताकि कानून अपराधियों के लिए डर बने, निर्दोषों के लिए डर का कारण नहीं।

