लखनऊ। देश में बढ़ती बीमारियों, रासायनिक खेती और आवारा पशुओं की समस्या के बीच गौ आधारित एक नए और वैज्ञानिक मॉडल ने चर्चा का विषय बना दिया है। “विजेंद्र गौशाला” नाम से प्रस्तावित इस हाईटेक गौशाला मॉडल के माध्यम से न केवल गौ संरक्षण बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और ऑर्गेनिक खेती को भी नई दिशा देने का दावा किया जा रहा है।
इस मॉडल के सूत्रधार वीरेंद्र कुमार दुबे का कहना है कि गाय केवल दूध तक सीमित नहीं है, बल्कि गोबर और गोमूत्र के वैज्ञानिक उपयोग से खेती, ऊर्जा और रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। उनके अनुसार एक गाय से प्रतिदिन गोबर और गोमूत्र के माध्यम से लगभग 200 लीटर जीवामृत तैयार किया जा सकता है, जिसकी लागत बेहद कम और बाजार मूल्य कहीं अधिक है। प्रयोग के तौर पर 20 एकड़ भूमि में केवल दो गायों के गोबर-गोमूत्र से तैयार खाद का उपयोग किया गया, जिससे तीन महीने में फसल की गुणवत्ता देखकर गांव के लोग आश्चर्यचकित रह गए।
वीरेंद्र दुबे के अनुसार इस प्रस्तावित हाईटेक गौशाला में गायों के लिए वातानुकूलित वातावरण, संतुलित आहार और प्राकृतिक पोषण की व्यवस्था होगी। गायों को अंकुरित चारा, हाइड्रोपोनिक फीड, स्पाइरुलिना और सहजन जैसे सुपर फूड दिए जाएंगे, जिससे उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके उत्पादों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। उनका कहना है कि “अच्छा आउटपुट तभी संभव है, जब इनपुट भी शुद्ध और पौष्टिक हो।”
इस मॉडल में आय के चार प्रमुख स्रोत बताए गए हैं—दूध, जीवामृत, गोबर से तैयार प्राकृतिक पेंट और गायों की गतिविधियों से उत्पन्न ऊर्जा। दावा किया गया है कि केवल गोबर और गोमूत्र से ही एक गाय प्रतिदिन लगभग 500 रुपये तक की आय दे सकती है, जबकि उसके रखरखाव की लागत करीब 180 रुपये प्रतिदिन आती है। इस तरह दूध न देने की स्थिति में भी गौशाला लाभ में रह सकती है।
योजना के तहत एक हाईटेक गौशाला में लगभग 150 से 200 गायों को रखने की व्यवस्था होगी, जिसके लिए करीब दो एकड़ भूमि और लगभग दो से सवा दो करोड़ रुपये की लागत अनुमानित है। इससे प्रत्यक्ष रूप से लगभग 65 लोगों को रोजगार मिलने की संभावना जताई गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया है। आगे चलकर महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से गौशालाओं के संचालन और निवेश की योजना भी बनाई गई है, ताकि गांव की महिलाएं नियमित आय प्राप्त कर सकें।
वीरेंद्र दुबे का मानना है कि वर्तमान में अधिकांश सरकारी गौशालाएं आश्रय केंद्रों के रूप में कार्य कर रही हैं, जहां गायों का केवल संरक्षण होता है, जबकि उनका मॉडल गाय को सम्मानजनक जीवन देने के साथ-साथ उसे आर्थिक रूप से उपयोगी भी बनाता है। उनका कहना है कि “जब गाय से जुड़े उत्पाद खेती में रासायनिक खाद का विकल्प बनेंगे, तो जमीन की उर्वरता बढ़ेगी और लोगों की थाली तक शुद्ध भोजन पहुंचेगा।”
इस परियोजना की शुरुआत जनसहयोग और दान के माध्यम से करने की योजना है। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि यदि समाज आज थोड़ा सहयोग करे, तो भविष्य में स्वास्थ्य पर होने वाला बड़ा खर्च अपने आप कम हो जाएगा। परियोजना से जुड़े लोगों का मानना है कि यह पहल केवल एक गौशाला नहीं, बल्कि गांव, खेती और स्वास्थ्य को जोड़ने वाला एक समग्र मॉडल है, जो सफल होने पर देशभर में अपनाया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में 1.16 लाख हाईटेक गौशालाओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गौ-रक्षा का नया मॉडल अगर पूरा हो तो आइए देखते हैं एक आंकड़ा
महिला स्वरोजगार का बड़ा ढांचा
इस योजना के अनुसार,
प्रत्येक गौशाला में 100 महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जाएगा।
इस प्रकार कुल 1,16,38,800 महिलाएं (करीब 1.16 करोड़) इस योजना से सीधे लाभान्वित होंगी।
प्रत्येक महिला को किस्त जमा करने के बाद ₹8,000 प्रतिमाह की नियमित आय सुनिश्चित की जाएगी।
कुल मासिक महिला आय का अनुमान
1,16,38,800 महिलाएं × ₹8,000
= ₹93,11,04,00,000 प्रति माह
(लगभग ₹9,311 करोड़ मासिक)
यह राशि सीधे ग्रामीण परिवारों तक पहुंचेगी, जिससे गांवों में क्रय शक्ति और जीवन स्तर में बड़ा सुधार होगा।
गौ-रक्षा का अभूतपूर्व आंकड़ा
प्रत्येक गौशाला में 100 गायों के संरक्षण की व्यवस्था होगी।
कुल गौ-रक्षा:
1,16,388 गौशाला × 100 गाय
= 1,16,38,800 गायों की रक्षा
यानी लगभग 1.16 करोड़ गायें।
यह योजना आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत करती है।
एक गाय से होने वाली आर्थिक बचत
योजना के अनुसार,
एक गाय से गोबर-गोमूत्र आधारित मॉडल द्वारा ₹300 प्रतिदिन की शुद्ध बचत संभव है।
कुल दैनिक बचत
1,16,38,800 गाय × ₹300
= ₹34,91,64,00,000 प्रतिदिन
(लगभग ₹349 करोड़ प्रतिदिन)
वार्षिक बचत का अनुमान
₹349 करोड़ × 365 दिन
= ₹1,27,385 करोड़ प्रति वर्ष (लगभग)
यह बचत रासायनिक खाद, बिजली, पेंट और अन्य संसाधनों के विकल्प के रूप में सामने आएगी।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
इस मॉडल से:
जैविक खेती को व्यापक बढ़ावा मिलेगा
स्वास्थ्य खर्च में दीर्घकालिक कमी आएगी
गांवों में स्थानीय रोजगार सृजन होगा
महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ेगी
गौ-आधारित उत्पादों से स्थायी आय स्रोत विकसित होंगे
विशेषज्ञों के अनुसार, यह योजना केवल गौशाला निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत के लिए एक समग्र आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन का मॉडल बन सकती है।
यदि यह परियोजना चरणबद्ध तरीके से लागू होती है, तो उत्तर प्रदेश न केवल गौ-रक्षा बल्कि महिला नेतृत्व आधारित ग्रामीण विकास का राष्ट्रीय उदाहरण बन सकता है।
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