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“मीडियॉक्रिटी की बीमारी: क्यों एवरेज लोग कभी खुश नहीं रहते? | NLP और न्यूरोसाइंस का सच”



मीडियॉक्रिटी: औसत बने रहने की मानसिक बीमारी और उससे बाहर निकलने का रास्ता

— अर्चना सिंह, NLP Trainer, Meditation Expert एवं मानस चिकित्सा विशेषज्ञ

अगर आप इस लेख को पढ़ रहे हैं, तो यह मानने में कोई संकोच नहीं कि आप भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहते। लेकिन एक कड़वा सच यह है कि हमारे विचार, हमारी आदतें और हमारी दिनचर्या हमें अक्सर उसी औसत भीड़ में खड़ा कर देती हैं। यही स्थिति आज की सबसे बड़ी अदृश्य महामारी है, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में “मीडियॉक्रिटी” यानी औसत बने रहने की बीमारी कहा जा सकता है।

महान दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि किसी इंसान के लिए इससे बड़ी शर्म की बात कुछ नहीं हो सकती कि वह बूढ़ा हो जाए और कभी अपनी शारीरिक व मानसिक क्षमता की पूरी सीमा को न देख पाए, जिसके लिए उसका शरीर और मस्तिष्क बना था। सवाल यह नहीं है कि हम जी रहे हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या हम सच में पूरा जी रहे हैं या सिर्फ जिंदगी काट रहे हैं।

आज का मनुष्य एक ऐसे झूठ में जी रहा है जिसमें उसे सिखाया गया है कि “जितना चल जाए, उतना काफी है।” छात्र से कहा जाता है कि बस पास हो जाओ, नौकरी ऐसी चुनो जिसमें ज्यादा चुनौती न हो, जीवन में जोखिम मत लो। धीरे-धीरे आराम को हमने अपना भगवान बना लिया है। यही आराम जब आदत बन जाता है, तो व्यक्ति के भीतर छिपी असाधारण क्षमता को मार देता है।

न्यूरोसाइंस बताता है कि हमारा दिमाग, विशेष रूप से उसका पुराना हिस्सा जिसे लिंबिक सिस्टम कहा जाता है, हमें सुरक्षित रखने के लिए बना है, महान बनाने के लिए नहीं। यही कारण है कि जब हम जोखिम लेते हैं, नया रास्ता चुनते हैं या खुद को चुनौती देते हैं, तो दिमाग हमें रोकने लगता है। यह आलस्य नहीं है, बल्कि जैविक गुलामी है। और इसी गुलामी का नाम है मीडियॉक्रिटी।

डेविड गोगिंस जैसे लोग इस मानसिकता को तोड़ने का जीवंत उदाहरण हैं। उनके अनुसार समस्या अक्सर वजन, करियर या परिस्थितियां नहीं होतीं, बल्कि समस्या यह होती है कि इंसान ने भीतर से लड़ना छोड़ दिया होता है। जैसे ही जीवन कठिन होता है, वह रास्ता बदल लेता है। यह सोच धीरे-धीरे व्यक्ति से हर चुनौती का सामना करने का आत्मविश्वास छीन लेती है।

न्यूरोसाइंस की एक महत्वपूर्ण खोज बताती है कि हमारे मस्तिष्क में एंटीरियर मिड सिंगुलेट कॉर्टेक्स नाम का एक हिस्सा होता है, जिसे इच्छाशक्ति की मांसपेशी कहा जा सकता है। शोध में पाया गया कि यह हिस्सा उन्हीं लोगों में विकसित होता है जो जानबूझकर कठिन काम करते हैं। जब आप मन न होने के बावजूद व्यायाम करते हैं, ठंडे पानी से स्नान करते हैं या मुश्किल किताब पढ़ते हैं, तो यह हिस्सा मजबूत होता है। यदि जीवन में संघर्ष नहीं है, तो मस्तिष्क सचमुच सिकुड़ने लगता है।

जीवन में असंतोष और खालीपन का एक बड़ा कारण यह है कि हमारे वर्तमान स्वरूप और हमारी संभावित क्षमता के बीच एक गहरी खाई बन जाती है। भीतर की आत्मा जानती है कि हम बेहतर कर सकते हैं, लेकिन जब हम प्रयास नहीं करते, तो वही आत्मा हमें बेचैनी के रूप में संकेत देने लगती है। इस बेचैनी से बचने के लिए हम मोबाइल स्क्रॉल करते हैं, जंक फूड खाते हैं या नशे का सहारा लेते हैं। यह सब असल में आत्मा की आवाज को दबाने के अस्थायी उपाय हैं।

डेविड गोगिंस का प्रसिद्ध “40% नियम” इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जब हमारा दिमाग कहता है कि हम पूरी तरह थक चुके हैं, तब वास्तव में हमने अपनी क्षमता का सिर्फ 40 प्रतिशत ही उपयोग किया होता है। शेष शक्ति अभी भी हमारे भीतर सुरक्षित रहती है। फर्क सिर्फ इतना है कि हम उस सीमा के पार जाने का साहस करते हैं या नहीं।

स्टोइक दर्शन में मार्कस ऑरेलियस ने कहा था, “बाधा ही रास्ता है।” दर्द और संघर्ष से भागने वाला व्यक्ति अंततः जीवन से ही डरने लगता है, जबकि जो व्यक्ति स्वेच्छा से कठिनाइयों को चुनता है, उसके लिए जीवन की पीड़ा भी उसे तोड़ नहीं पाती। दर्द का यही विरोधाभास है।

मानस चिकित्सा और NLP के अनुभव से यह स्पष्ट है कि जीत और हार दोनों आदतें हैं। जब हम सुबह अलार्म बंद करके दोबारा सो जाते हैं, तो हम अपने मस्तिष्क को हार की ट्रेनिंग दे रहे होते हैं। वहीं जब हम थकान के बावजूद थोड़ा और प्रयास करते हैं, तो दिमाग में ऐसे रसायन सक्रिय होते हैं जो आत्मविश्वास और साहस को मजबूत करते हैं।

परिवर्तन के लिए मोटिवेशन का इंतजार करना सबसे बड़ी भूल है। मोटिवेशन अस्थायी होता है। असली बदलाव तब आता है जब व्यक्ति अपनी पहचान बदलता है। रोज़ कुछ ऐसा करना जो मन को पसंद न हो, दिमाग को यह सिखाता है कि नियंत्रण किसके हाथ में है। यही अभ्यास धीरे-धीरे व्यक्ति को औसत से असाधारण की ओर ले जाता है।

अंत में, हमें यह समझना होगा कि बिना संघर्ष के न तो व्यक्ति विकसित होता है और न ही समाज। आराम का अतिरेक व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देता है। जीवन के अंतिम क्षणों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि आपने कितना आराम किया, बल्कि यह होगा कि आपने अपनी पूरी क्षमता को कितना जिया।

औसत बने रहना आसान है, लेकिन आत्मा को संतुष्टि नहीं देता। संघर्ष कठिन है, लेकिन वही जीवन को अर्थ देता है। चुनाव हर व्यक्ति को स्वयं करना है।