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आपदाओं को नहीं, रेज़ीलियंस को दीजिए वित्तीय प्राथमिकता अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस 2025 पर विशेष सम्पादकीय



प्राकृतिक आपदाएं चाहे कितनी भी सामान्य प्रतीत हों, उनका प्रभाव विनाशकारी होता है। वे न केवल लोगों की जान और माल का नुकसान करती हैं, बल्कि विकास की वर्षों की मेहनत को कुछ ही क्षणों में मिटा सकती हैं। यही कारण है कि हर वर्ष 13 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस  मनाया जाता है, ताकि हम यह पुनः मूल्यांकन कर सकें कि हमारी विकास नीतियाँ, बजट प्राथमिकताएं और निवेश निर्णय कितने जोखिम-संवेदनशील हैं।

वर्ष 2025 की थीम “Fund Resilience, Not Disasters” अर्थात "आपदाओं को नहीं, लचीलापन को वित्त पोषण करें"  एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक संदेश देती है। यह थीम यह स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि अब समय आ गया है कि हम केवल आपदाओं के बाद राहत और पुनर्वास के लिए धन खर्च करने की प्रवृत्ति से बाहर निकलें और उससे पहले, जोखिम को कम करने के लिए पूर्व-नियोजन और लचीलापन निर्माण  पर निवेश करें।

अभी तक की वैश्विक और राष्ट्रीय आपदा रणनीतियाँ अधिकतर प्रतिक्रिया-प्रधान  रही हैं अर्थात् आपदा घटित होने के बाद प्रतिक्रिया देना, राहत पहुंचाना और पुनर्निर्माण करना। परंतु, यह दृष्टिकोण महंगा भी है और टिकाऊ भी नहीं। उदाहरणस्वरूप, जब किसी शहर में बाढ़ आती है, तब सड़कें, पुल, और घर नष्ट हो जाते हैं  फिर हम इन्हें दोबारा उसी स्थान पर, अक्सर बिना संरचनात्मक बदलावों के, बना देते हैं, जिससे अगली आपदा में फिर वही स्थिति उत्पन्न होती है।

इसके विपरीत, यदि हम पहले से बाढ़-रोधी ढांचे, सतत जल-प्रबंधन, और सुरक्षित आवास योजनाओं पर निवेश करें, तो आपदा आने पर उसका प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही है लचीलापन निर्माण — ऐसी व्यवस्था और संरचना बनाना, जो संकट आने पर न केवल बचाव कर सके, बल्कि शीघ्रता से पुनर्बहाली भी कर सके।

संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न विकास संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) पर किया गया हर 1 डॉलर का निवेश भविष्य में होने वाले 6 से 10 डॉलर के नुकसान को बचा सकता है। बावजूद इसके, आज भी अधिकांश देशों के बजट में DRR को प्राथमिकता नहीं दी जाती। अंतरराष्ट्रीय अनुदानों और ऋणों में भी केवल एक छोटा हिस्सा ही लचीलापन निर्माण के लिए आवंटित होता है।

थीम “Fund Resilience, Not Disasters” हमें इस प्रवृत्ति को बदलने का आग्रह करती है। इसमें यह अपील छिपी है कि: सरकारें अपने वार्षिक बजट में आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए अलग से धन आवंटित करें, निजी कंपनियाँ अपने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंड का एक हिस्सा सतत और सुरक्षित विकास में लगाएं, सभी विकास परियोजनाओं को जोखिम-संवेदनशील नियोजन (risk-informed planning) के साथ लागू किया जाए, अंतरराष्ट्रीय विकास बैंक और संस्थाएं ऋण देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि जिन परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी जा रही है, वे जलवायु और आपदा-प्रतिरोधक हैं।

भारत भौगोलिक दृष्टि से एक आपदा-संवेदनशील देश है।  यहाँ बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूकंप, भूस्खलन जैसी अनेक आपदाएं हर साल किसी न किसी राज्य को प्रभावित करती हैं। 2023, 2025और 2024 में उत्तराखंड, असम, ओडिशा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कई बार बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं देखी गईं, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान गई और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ।

इन अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि सिर्फ आपदा के बाद राहत कार्यों में करोड़ों रुपये खर्च करने से बेहतर है कि हम पूर्व-नियोजन, सतत ढांचागत विकास, मजबूत आपदा चेतावनी प्रणाली, और सामुदायिक भागीदारी में निवेश करें।

सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाएँ जैसे कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, स्मार्ट सिटी मिशन में DRR का समावेश, तथा आपदा लचीली आवास योजनाएं सराहनीय प्रयास हैं, परंतु इनका बजटीय समर्थन और कार्यान्वयन क्षमता अभी भी मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।

IDDRR 2025 की थीम के अनुरूप भारत ने एक और ऐतिहासिक कदम उठाया है  "सभी के लिए जोखिम कवरेज" (Risk Coverage for All) का लक्ष्य। इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के प्रत्येक नागरिक, विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग, प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान के विरुद्ध वित्तीय रूप से सुरक्षित हो।

इस दिशा में भारत द्वारा किए गए कुछ उल्लेखनीय प्रयास:

1. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)

यह योजना किसानों को फसल खराब होने की स्थिति में बीमा कवरेज प्रदान करती है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती आपदाओं के बीच यह किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण लचीलापन उपकरण बन चुकी है।

2. प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY)

कम प्रीमियम पर जीवन और दुर्घटना बीमा उपलब्ध कराने वाली ये योजनाएं विशेषकर निम्न आय वर्ग के लिए आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं, जो आपदा आने की स्थिति में उनके परिवार को वित्तीय स्थिरता देती हैं।

3. स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड (SDRF) और नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड (NDRF)

इन फंडों के माध्यम से सरकार न केवल राहत कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराती है, बल्कि अब DRR गतिविधियों के लिए भी इनका उपयोग किया जा रहा है।

4. डिजिटल सार्वजनिक प्लेटफॉर्म और डेटा मैपिंग

भारत सरकार द्वारा GIS आधारित निर्णय समर्थन प्रणाली, आपदा चेतावनी मोबाइल ऐप्स, और राष्ट्रीय भू-स्थानिक पोर्टल का विकास किया गया है, जिससे आपदाओं के जोखिम और बीमा योजनाओं को एकीकृत करने की दिशा में कार्य हो रहा है।

लचीलापन केवल सरकारों या संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके निर्माण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। ग्राम स्तर पर आपदा योजना, स्कूलों में DRR शिक्षा, महिलाओं और युवाओं को प्रशिक्षित करना — ये सभी उपाय समाज को आपदा के प्रति अधिक सजग और सक्षम बनाते हैं।

वर्ष 2025 की थीम "Fund Resilience, Not Disasters" एक स्पष्ट संदेश देती है — अब समय है नीतियों और प्राथमिकताओं में बदलाव लाने का। यह बदलाव केवल विचारों का नहीं, बल्कि बजट, निवेश, और नियोजन स्तर पर होना चाहिए।

अगर हम सचमुच एक सुरक्षित, टिकाऊ और समावेशी भविष्य की कल्पना करते हैं, तो हमें विकास को आपदा-प्रतिकारक बनाना ही होगा। यह तभी संभव है जब हम आज लचीलापन में निवेश करेंगे — ताकि कल आपदा आने पर केवल प्रतिक्रिया देने की जरूरत ही न पड़े।

आकांक्षा पांडे, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ, (वर्तमान में राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में आपदा प्रबंधन की सहायक प्रोफेसर)