📰 सत्यबन्धु भारत / विशेष संवाददाता
लखनऊ। कभी गणित और बैंकिंग की तार्किक दुनिया में सक्रिय रहे डॉ. अशोक शर्मा ने सेवानिवृत्ति के बाद जिस नई यात्रा की शुरुआत की, वह आज साहित्य और अध्यात्म के क्षेत्र में एक मिसाल बन चुकी है। गणित में पीएचडी और फ्रेंच भाषा में दक्षता रखने वाले डॉ. शर्मा ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में कलम उठाई और देखते ही देखते आध्यात्मिक व पौराणिक विषयों पर आधारित अनेक चर्चित पुस्तकों के लेखक बन गए।
उनकी लेखनी की खासियत यह है कि वे परंपरागत कथाओं को केवल दोहराते नहीं, बल्कि उनमें छिपे प्रश्नों, विरोधाभासों और अनकहे पक्षों को तर्क और संवेदनशीलता के साथ सामने लाते हैं।
आलोचनाओं के बीच शुरू हुई लेखनी, बनी पहचान
डॉ. शर्मा बताते हैं कि जब उन्होंने अपनी पहली पुस्तक “कृष्ण अंतिम दिनों में” लिखी, तो साहित्यिक मित्रों ने उन्हें समसामयिक विषयों पर लिखने की सलाह दी। लेकिन उन्होंने अपने मन की सुनी।
“मुझे लगा कि जो सब लिख रहे हैं, वो मैं क्यों लिखूं? मुझे वही लिखना है जिसमें मेरी श्रद्धा है,” — डॉ. अशोक शर्मा
उनकी यह जिद ही आगे चलकर उनकी पहचान बन गई। आज उनकी पुस्तकों को देशभर में सराहा जा रहा है।
पौराणिक पात्रों पर नए दृष्टिकोण
डॉ. शर्मा की पुस्तकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पौराणिक पात्रों को नए नजरिए से प्रस्तुत करते हैं।
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कृष्ण पर लिखते हुए उन्होंने 16,108 रानियों जैसे विवादित प्रसंगों को तार्किक दृष्टि से समझाने का प्रयास किया।
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सीता के चरित्र में उन्होंने उनकी आंतरिक भावनाओं और मनोस्थिति को शब्द दिए।
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शूर्पणखा को उन्होंने केवल “राक्षसी” नहीं, बल्कि परिस्थितियों से पीड़ित एक स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया।
उनका मानना है कि कई कथाएं समय के साथ विकृत हो गईं और उन्हें पुनः समझने की आवश्यकता है।
सीता के दृष्टिकोण को दी आवाज
अपनी पुस्तक “सीता सोचती थीं” में डॉ. शर्मा ने सीता के मन में उठने वाले विचारों को प्रमुखता दी। उन्होंने बताया कि रामायण में सीता एक सक्रिय पात्र हैं, लेकिन उनके मन की स्थिति पर कम ध्यान दिया गया।
उन्होंने सीता के जीवन के विभिन्न चरणों—वनवास, रावण द्वारा अपहरण, अग्नि परीक्षा और वाल्मीकि आश्रम तक—को भावनात्मक गहराई से प्रस्तुत किया।
समाज और परंपराओं पर स्पष्ट राय
डॉ. शर्मा सामाजिक मुद्दों पर भी खुलकर अपनी बात रखते हैं। वे मानते हैं कि इतिहास और परंपराओं से सीख लेना जरूरी है, लेकिन आंख मूंदकर स्वीकार करना उचित नहीं।
“अग्नि परीक्षा जैसी परंपराएं उचित नहीं थीं, लेकिन वे समाज के लिए उदाहरण बन गईं। आज जरूरत है उन्हें समझने की, न कि केवल मानने की।”
सम्मान और उपलब्धियां
डॉ. अशोक शर्मा की साहित्यिक यात्रा को देशभर में सराहा गया है।
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कई राज्यों के राज्यपालों द्वारा सम्मानित
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उत्तर प्रदेश की राज्यपाल द्वारा राजभवन में विशेष सम्मान
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उनकी पुस्तकों की प्रशंसा
इतना ही नहीं, उनकी पुस्तकों और व्यक्तित्व पर शोध भी किया गया है, जो अपने आप में एक दुर्लभ उपलब्धि है।
युवाओं के लिए संदेश
डॉ. शर्मा युवाओं को संतुलन का संदेश देते हैं। उनका मानना है कि केवल रुचि या केवल आजीविका—दोनों में से किसी एक पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं।
“रुचि और सार्थकता दोनों जरूरी हैं। तभी जीवन संतुलित और सफल बनता है।”
पॉडकास्ट में हुई विस्तृत चर्चा
डॉ. अशोक शर्मा के जीवन, उनकी पुस्तकों और उनके विचारों पर विस्तृत बातचीत Satyabandhu Bharat YouTube Channel पर उपलब्ध है। 👉 इस पूरी बातचीत को दर्शक चैनल पर जाकर विस्तार से देख सकते हैं।
निष्कर्ष
डॉ. अशोक शर्मा की यात्रा यह साबित करती है कि रिटायरमेंट अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत हो सकती है। तार्किक दुनिया से निकलकर उन्होंने अध्यात्म और साहित्य में जो योगदान दिया है, वह न केवल प्रेरणादायक है बल्कि समाज को नई दिशा भी देता है।
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