गुड़गाँव की रहने वाली शानू राव (Yadav) आज ज़ी टीवी के शो जागृति में ‘नीति’ का अहम किरदार निभा रही हैं। लेकिन उनकी यह सफलता सुनने में जितनी आसान लगती है, असल में उतनी ही कठिनाई और दर्द से भरी रही है।
बचपन से ही शानू का सपना था कि वह अभिनेत्री बने। मगर परिवार की परिस्थितियाँ उनके लिए बड़ी बाधा थीं। माता-पिता आर्म्ड फोर्सेस में थे, जिसके कारण हर कुछ सालों में तबादले होते रहते थे। किसी भी शहर में लंबे समय तक टिकना मुश्किल था। ऐसे माहौल में अपने सपनों के लिए रास्ता बनाना किसी पहाड़ पर चढ़ने जैसा था। जब परिवार अंततः गुड़गाँव में स्थायी हुआ, तब जाकर उन्होंने केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई पूरी की। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन किया।
मुंबई का सफर उनके लिए उम्मीदों और आँसुओं का संगम रहा। शुरुआती दिनों में वह रोज़ कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर ऑडिशन देने जातीं। कई बार बिना कुछ खाए-पिए घंटों लाइन में खड़ी रहतीं और अंत में सिर्फ़ “हम आपको कॉल करेंगे” कहकर लौटा दी जातीं। अक्सर रिजेक्शन के बाद घर लौटते हुए ऑटो या बस का किराया तक नहीं बचता था। थकी हुई आँखों से रात भर रोना और सुबह फिर नए जोश के साथ अगला ऑडिशन देना उनकी दिनचर्या बन गया था।
करीब 600–700 बार रिजेक्शन झेलने के बाद उन्हें पहला काम मिला, जो मात्र 8–10 सेकंड का रोल था। ज़्यादातर लोग ऐसे मौके को नज़रअंदाज़ कर देते, लेकिन शानू ने उसे अपनी सबसे बड़ी जीत माना। उनका मानना है कि यह छोटा-सा काम ही उनके संघर्ष का असली मोड़ बना।
शानू कहती हैं, “हर रिजेक्शन मुझे तोड़ देता था। कई बार लगा कि शायद यह इंडस्ट्री मेरे लिए नहीं है। लेकिन अगले ही पल मेरे अंदर की आवाज़ कहती कि नहीं, यही मेरा सपना है और मुझे इसे पूरा करना है। जिन लोगों ने कहा कि मैं पर्याप्त सुंदर नहीं हूँ या इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं हूँ, उन्हीं बातों ने मुझे और मज़बूत बना दिया।”
आज शानू राव ‘नीति’ के रूप में एक गाँव की उस लड़की की कहानी कह रही हैं, जो पति के अत्याचार और हिंसा को सहती रहती है। यह भूमिका निभाना उनके लिए बेहद कठिन था, क्योंकि उनकी असल ज़िंदगी इससे बिल्कुल विपरीत है। शानू बताती हैं, “मैं एक आधुनिक लड़की हूँ और हिंसा को बर्दाश्त नहीं करती। ऐसे में अपने आप को एक चुपचाप सहने वाली ग्रामीण स्त्री में ढालना बहुत चुनौतीपूर्ण था। लेकिन मुझे मेहनत करना पसंद है और यह किरदार मुझे रोज़ नया सीखने का मौका देता है।”
शानू का मानना है कि उनकी जर्नी सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि हर उस लड़की की कहानी है जिसने हालात से समझौता नहीं किया और अपने सपनों पर भरोसा रखा। उनका संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि सपनों तक पहुँचने का रास्ता आँसुओं, मेहनत और असंख्य असफलताओं से होकर गुजरता है।
आज उनकी मेहनत का फल यह है कि गुड़गाँव की यह बेटी मायानगरी मुंबई में अपनी पहचान बना रही है और लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।




