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शांति तभी अस्तित्व में आती है, जब हम भूतकाल के लिए मर जाते हैं



क्यों हम यह चाहते हैं कि मरे हुए लोग शांति से रहें? क्यों जीवन जीना हमारे लिए युद्ध के समान है? हर पल कुछ ना कुछ प्राप्त करने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहते है हम। दूसरो से बेहतर बनना–करना, भागते ओर भोगते रहना, विचलित रहना, निरंतर मानसिक युद्ध लड़ना अपने विचारों से। अधिकांश धर्मों में, स्वर्ग को सुंदर बगीचों, नदियों और पहाड़ों से भरे शाश्वत शांति और शांति के स्थान के रूप में वर्णित किया गया है। एक ऐसी जगह जहां सब कुछ एक-दूसरे के साथ सद्भाव में है। क्या आप यह देख पा रहे हैं कि, मृत्यु और शांति एक हैं। शांति तभी अस्तित्व में आती है जब हमारे प्राण निकल जाते हैं। अपितु यह मृत्यु शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक भी संभव है। सभी बीते कल को भुल जाना, भूतकाल के लिए मर जाना, कोई भी बीते हुए पल कि ऐसी याद ना रखना जो आपके वर्तमान पर हावी हो, सभी लालसाओं, अधूरी इच्छाओं और भय के लिए मर जाना। ऐसा व्यक्ति बनना जो किसी से कुछ अपेक्षा नहीं रखता, स्वयं से भी नहीं। क्योंकि जिस क्षण हम अपनी एक पहचान बना लेते हैं, वह पहचान खुद को बेहतर बनाए रखने के लिए हर चीज़ से युद्ध करती रहती है। जीवन को बंद डब्बे में ना जिएं, खुल के जिएं। हर पल आज़ाद, प्रेम ओर शान्ति से भरपूर जिएं।

Dishaji (Spritual Mentor &Vedic Commentator