शीतल, प्रवक्ता हिन्दी शिक्षा निदेशालय, दिल्ली
यह विडंबना ही है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है परन्तु कृषक प्रधान नहीं। एक ग्रामीण परिवेश का बच्चा जब अपने परिवार को पूस की रातों, भीषण गर्मी के दिनों में धूप छाँव की बगैर परवाह किए काम करते हुए देखता है फिर भी उन्हें गरीबी के दुष्चक्र से मुक्त नहीं हो पाता है तब वह स्कूल से निकलकर कोई भी छोटी-मोटी नौकरी कर लेना चाहता है पर रैय्यत नहीं बनना चाहता क्योंकि उसने अपने माता पिता को इसी काम में अपनी जिंदगी होम करते हुए देखा है। कमोबेश यही हाल प्राथमिक सेक्टर के सभी अन्य उदाहरणों का भी है खनन, वानिकी आदि कार्य में गहन परिश्रम के साथ साथ जान जोखिम का खतरा बना रहता है| इसके अतिरिक्त सेवा क्षेत्र में काम करने के निश्चित घंटे और सामाजिक प्रतिष्ठा ने उसे स्कूली छात्रों की चाह में अव्वल दर्जा दिला दिया| हमारा बच्चा शहर में नौकरी करता है'' गाँव के संदर्भ में तो मुख्य रूप से यह उक्ति प्रतिष्ठा और सम्मान की सूचक बन गयी।
किसी भी देश के विकास में एक निश्चित पैटर्न नज़र आता है जैसे एक देश कृषि प्रधान (प्राथमिक सेक्टर) से द्वितीयक सेक्टर (विनिर्माण आदि) की ओर अग्रसर होता है और अंततः सेवा क्षेत्र (नौकरी) की ओर तब्दील होता है परंतु भारत के संदर्भ में यह कहानी अनोखी रही। भारत ने प्राथमिक क्षेत्रक से सीधा निकल कर सेवा क्षेत्र की ओर कदम बढ़ाया ऐसे में नौकरी की ओर आकर्षण बढ़ना लाजिमी था। निजीकरण, उदारीकरण, भूमंडलीकरण( एलपीजी) के आ जाने के बाद देश में एमएनसी की बाढ़ आने लगी, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल जैसी बडी कंपनियों ने रोजगार के अवसर भी प्रदान किए। भारत विश्व में मैनपावर सप्लाई करने में अग्रणी देश के रूप में उभरा। विदेश जाकर नौकरी करने की चाह भी बलवती हुई तो देश का युवा इस ओर बहुत आकर्षित हुआ इसके अतिरिक्त नौकरी में स्थायित्व, निश्चित राशि का हर महीने प्राप्त होना जिससे तनाव का कम होना, बचे हुए समय में अपनी निजी ज़िन्दगी को गुणात्मक समय दे पाना जबकि ऐसा व्यवयास या कृषि तथा अन्य कार्यों में संभव नहीं था, काम करने के निश्चित घंटे, और सामाजिक प्रतिष्ठा ने उसे स्कूली छात्रों की चाह में अव्वल दर्जा दिला दिया। आज की युवा पीढ़ी ने 1929 की मंदी तो नहीं देखी परंतु वर्तमान समय में स्कूल से निकले बच्चे का साक्षात्कार 2008 की मंदी से ही हुआ है। आँकड़े बताते है कि भारत ने उस मंदी के दौरान भी 8.6% की विश्व की सबसे तीव्र वृद्धि दर्ज की। तो इस कारण ने भी नौकरी को सेफ़ ज़ोन में आरक्षित कर दिया।
अब यह प्रश्न भी जेहन में आना लाज़मी है कि प्रतिष्ठा, सम्मान, दौलत और शोहरत तो बिज़नेस को चुनने पर भी मिल सकती थी फिर नौकरी ही क्यों? एक तो बिजनेस के लिए इन्वेस्टमेंट बहुत चाहिए था और भारत की बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। जिसके लिए इतने जोख़िम उठाना संभव नहीं है क्योंकि बिज़नेस के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता होती है साथ ही और अधिकांश जितना निवेश लगता है उस अनुरूप फायदा नहीं होता है। छोटे शहरों के व्यवसायियों के साथ अलग प्रकार की समस्या है कम पूंजी में व्यवसाय शुरू तो हो जाता है परन्तु बिक्री कम होने या ग्राहकों की सीमित संख्या के कारण उनकी आय भी सीमित हो जाती है और वे एक दायरे में बंधकर रह जाते हैं जिसके कारण उनका आकर्षण कम होता चला जाता है|
इन सब से परे कुछ अप्रत्याशित अभूतपूर्व कारण भी नौकरी की चाह को बलवती बनाते हैं| पूरे विश्व ने कोरोना महामारी में बड़े से बड़े कारोबारियों, उद्योगपतियों को घर बैठने पर विवश कर दिया| बहुत लोगों के सामने तो एक वक़्त की रोटी का प्रश्न भी खड़ा हो गया| ऐसे में नौकरी उसमें भी सरकारी नौकरी एक उम्मीद जगाती रही| वैश्विक संकट की स्थिति में भी खाड़ी देशों में काम कर रहे मजदूरों को ‘पिंक स्लिप्स’ थमाना आम बात हो चली है| इसके अतिरिक्त औपनिवेशिक काल की मानसिकता भी इसके लिए उत्तरदायी है जिसने नौकरीपेशा लोगों को ही भविष्य के लिए तैयार किया|
पर इन सब कारणों के परे जाकर हम सोचें तो हम पाएंगे कि आज के स्टार्टअप्स की सफलता की कहानियाँ कुछ और ही बयाँ करती है।
अब लगता है कि इस बात को एक नये एंगल से देखने की भी ज़रूरत है। हमने उस बच्चे को नौकरी से हटकर सोचने के लिए कभी तैयार ही नहीं किया। हमने उसे ज़िन्दगी में ‘सेफ़ ज़ोन’ से बाहर रिस्क लेने के लिए तैयार ही नहीं किया। हमने 'सेल्फ मेड' बनने का गुर अपने विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सिखाया ही नहीं। हमने उस बच्चे के सामने विज्ञान, उद्योगों की बातें तो की पर कभी वैज्ञानिकों, उद्योगपति या अन्य क्षेत्र के लोगों से विद्यालय में रूबरू नहीं कराया। जिससे वे इनकी सफलता की कहानी सुन सकते, इनसे प्रेरणा ले सकते। हमने अपने पाठ्यक्रम में अब तक कभी एंत्रप्रेन्योरशिप का कौशल सिखाया ही नहीं।
आज भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्टार्टअप इंडिया कार्यक्रम ने कितने युवाओं के सपनों को नई उड़ान दी है| स्किल इंडिया कार्यक्रम ने अब तक एक करोड़ लोगों को प्रशिक्षण दिया है| ज़रूरत है इक्कीसवीं सदी के सतत रोजगार उत्पन्न किए जाए जिससे इन प्रशिक्षित लोगों को रोजगार मिल सके साथ ही सतत विकास लक्ष्यों को जल्दी ही प्राप्त किया जा सके|
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में चल रहे एन्त्रप्रेन्योर कार्यक्रम ने भी विद्यार्थियों के मनोबल का काफी बढ़ाया है| इसमें न सिर्फ देश विदेश में बसे भारतीयों के सेल्फ मेड बनने की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनने के नतीजे सामने आने लगे हैं| नई शिक्षा नीति में शिक्षा को काम से जोड़ने की बात को पाठ्यक्रम में शामिल कर हमें ऐसे प्रयास करने होंगे कि स्कूल से निकले ये बच्चे बाहरी दुनिया में भी नौकरी लेने वाले नहीं बल्कि नौकरी देने वाले बनकर क्रांतिकारी बदलावों की एक नई इबारत लिख सकें|
