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शीर्षक : खेली जो आंगन में बिटिया



खेली जो आंगन में बिटिया, 

उसके रुखसत की तैयारी है।


जन्मी थी जब घर बिटिया तब,

कोना-कोना खुशियों से भर डाला।

उसके   पाने   की   चाहत   में,

दर-दर   मन्नत   कर   डाला।। 

देखा   चाँद    सा    मुखड़ा, 

तब जाना क्या होती किलकारी है।

खेली जो आंगन में बिटिया,

उसके रुखसत की तैयारी है।।


नन्हें-नन्हें पैरों से जब,

धूल समेट के लाती थी। 

माँ हाथों में लेकर बेलन, 

जब उसको गुधनाती थी।।

तब  देखा  गुस्से  में  भी,  

लगती कितनी  प्यारी  है।

खेली जो आँगन में बिटिया, 

उसके रुखसत की तैयारी है।।



लम्बी दूरी और कच्चा रस्ता,

फिर भी स्कूल  को जाती थी।

शाम को आकर सबसे पहले,

मां   को   ही   गोहराती   थी।।

उलझे-उलझे   बालों   में   भी, 

दिखती कितनी   न्यारी   है।

खेली जो आंगन में बिटिया, 

उसके रुखसत की तैयारी है।।


देखते-देखते ना जाने कब,

इतने से इतनी बड़ी हो गई।

थी अन्जानी पर ना जाने कब,

अपने पैरों पर खड़ी हो गई।।

घर    चलाने    में    भी,    

कितनी    होशियारी    है। 

खेली जो आंगन में बिटिया, 

उसके रुखसत की तैयारी है।।


वर्षों से था जिसका इंतजार,

आ   गई   वो   घड़ी   है।

मेरे जिगर के टुकड़े को लेने,

द्वार पर बारात खड़ी है।।

इधर जोड़े में खड़ी है दुल्हन,

उधर  घोड़े की सवारी है।

खेली जो आँगन में बिटिया,

उसके रुख़सत की तैयारी है।।


हम से बिछड़ने के लिए,

अब कुछ पल ही दूर है।

छूटे सारे नाते-बन्धन,

अब उसकी मांग में सिंदूर है।।

बाहर   खड़े   कहार   करें,  

डोली    की   तैयारी   है।

खेली जो आँगन में बिटिया, 

उसके रुखसत की तैयारी है।।


          ~ जितेन्द्र जय

            रायबरेली (उत्तर प्रदेश)