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लाभार्थियों को मौन वंश एवं सहायक उपकरण वितरण कार्यक्रम का आयोजन



बाराबंकी : ग्रासरूट फ़ाउंडेशन द्वारा सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संचालित स्फूर्ति योजना का संचालन ग्राम भानमऊ जिला बाराबंकी में किया जा रहा है। परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा देकर लाभार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने, नियमित जीविकोपार्जन एवं आय के स्रोत बढ़ाने के उद्देश्य से यह योजना संचालित की जा रही है। ग्रासरूट फ़ाउंडेशन महिलाओं, भूमिहीन एवं छोटे किसानों को मधुमक्खी पालन जैसे परंपरागत उद्योग के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर इस योजना द्वारा स्वरोजगार के अवसर प्रदान करने का कार्य कर रहा है। 



योजना के अंतर्गत प्रशिक्षित लाभार्थियों को आज मौन वंश एवं सहायक उपकरण वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें चयनित लाभार्थियों को उक्त उपकरण नि:शुल्क वितरित किए गए। 



मधुमक्खी पालन को व्यवसाय के रुप में आरंभ करें, इससे फसलों का उत्पादन बढ़ेगा साथ ही इसके व्यवसाय से आर्थिक रुप से सक्षमता भी मिलेगी। मधुमक्खी पालन ने एक कम लागत वाले कुटीर उद्योग का दर्जा ले लिया है। इसलिए महिलाएं यदि कृषि के साथ या एकल रूप में काम करना चाहती है तो उन्हें यह व्यवसाय शुरु करना चाहिए जो कम समय में ही महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ रोजगार भी मुहैया कराएगा। यह आमदनी का एक स्थायी साधन है। इस उद्योग द्वारा मधुमक्खी पालन से जुड़े कार्य जैसे बढ़ईगीरी, लोहारगिरी एवं शहद विपणन में भी रोजगार का अवसर मिलते है। ग्रासरूट फाउंडेशन की सी॰ई॰ओ॰ सुश्री अपर्णा मिश्रा ने यह जानकारी उपस्थित लाभार्थियों को दी। 



कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्त श्री उमेश चन्द्र जी ने प्रतिभागियों का मौन पालन को एक सफल आजीविका विकल्प के रूप में चुनने हेतु उत्साहवर्धन किया। उन्होने जिला उद्योग केंद्र द्वारा संचालित विभिन्न प्रशिक्षण/ रोजगारोन्मुखी योजनाओं के बारे में जानकारी भी दी। साथ ही महिलाओं के इतनी बड़ी संख्या में इस पुरुष प्रधान व्यवसाय से जुडने हेतु बधाई दी व उनका उत्साहवर्धन किया।



कार्यक्रम में उपस्थित मौन विशेषज्ञ श्री बलराम मिश्रा ने बताया कि मधुमक्खियां मौन  समुदाय में रहने वाली कीट वर्ग की वन्य जीव है इन्हें उनकी आदतों के अनुकूल कृत्रिम ग्रह (हाईव) में पाल कर उनकी वृद्धि करने तथा शहद एवं मोम आदि प्राप्त करने को मधुमक्खी पालन या मौन पालन कहते है। मौन पालन से शहद एवं मोम के अतिरिक्त अन्य पदार्थ, जैसे गोंद, प्रोपोलिस, रायल जेली, डंक-विष (Venum) आदि भी प्राप्त होते है। साथ ही मधुमक्खियों से फूलों में परागण होने के कारण फसलो की उपज में लगभग एक चैथाई अतिरिक्त बढ़ोत्तरी भी होती है। 



सुश्री तोमोशा मुखर्जी सी॰डी॰ई॰, ग्रासरूट फाउंडेशन ने जानकारी दी कि प्रथम चरण के रूप में बाराबंकी के विभिन्न ग्रामों में तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत लक्षित लाभार्थियों को मधुमक्खी पालन, उनकी देखभाल, रोग एवं कीड़ों से बचाव, शहद निकालने आदि का व्यावहारिक व तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा चुका है. द्वितीय चरण में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले चयनित प्रशिक्षणार्थियों को मधुमक्खी बक्से व आवश्यक उपकरण किट नि:शुल्क वितरित किये जाएंगे. जिससे ये प्रशिक्षणार्थी मधुमक्खी पालन का व्यवसाय अविलंब आरंभ कर सकें। तृतीय चरण के रूप में समय-समय पर इस व्यवसाय के लिए आवश्यक तकनीकी सहायता प्रदान की जायेगी.

श्री सर्वेश कुमार फील्ड कार्यकर्ता, ग्रासरूट फाउंडेशन ने मधुमक्खी पालन की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए बताया की शहद उत्पादन बढ़ाने हेतु माइग्रेशन नितांत आवश्यक है। साथ ही पराग और मकरंद देने वाले पुष्पों का वार्षिक चार्ट बनाकर उसके अनुसार माइग्रेशन करना चाहिए। इससे शहद का उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बढ़ते है।

श्री संतोष पाण्डेय संपादक, सत्यबंधु भारत  ने उद्यमिता को बढ़ावा देने में मीडिया/ ऑनलाइन मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डाला। 

कार्यक्रम के अंत में लाभार्थियों को मौन वंश व सहायक आवश्यक उपकरण (मधुमक्खी सहित बक्से, मुंह रक्षक जाली, हाइव टूल, धुआंकर, स्टैंड, पालन ट्रे, फीडर आदि) वितरित किए गए।     

कार्यक्रम में श्री परवेज़ (स्वतंत्र पत्रकार), श्री अखिलेश्वर पाण्डेय (राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ), श्रीमति राशिका शील (मार्केटिंग प्रबन्धक) एवं लगभग 120 लाभार्थियों/ प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम आयोजन में श्रीमति प्रवीण बानो, श्रीमति शालिनी सिंह, श्री सचिन, श्री सूरज सोनी का भी सरहनीय योगदान रहा।