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आधी आबादी की आज़ादी या बर्बादी


सत्यबन्धु भारत

सक्सेना जी बड़े शान से मुझे बताने लगे कि "बिटिया को 13 हजार का मोबाइल दिलाया, और लॉकडाउन में ही उसने इंटरनेट पर 40 हजार से ऊपर कमा लिए हैँ, बहुत सारे फॉलोवर हैँ उसके देश विदेश में।"
लेकिन मेरी मुस्कुराहट से थोड़ा असमंजस में पड़ गए और बार बार मुझसे कारण पूछने लगे। मैं उनको कुछ बताने के लिए सही शब्द नहीं पा रहा था, सो अपना मोबाइल निकाला और एक एप्प खोल के उनकी बिटिया का एकाउंट खोल के पकड़ा दिया, जैसे जैसे वीडियो स्क्रॉल करके वो देखते जा रहे थे उनके खून का संचार मानो थम से जा रहे थे, उनके सफ़ेद पड़ते चेहरे की गंभीरता को भाँपते हुए मैं अपना मोबाइल लेकर वहाँ से उठ के चला आया।
सच कहूं तो मुझसे उनकी अंतरपीड़ा देखी ना जा रही थी। मोहल्ले भर में सभी उनकी बिटिया के कारनामे जानते थे, एक उनको छोड़ कर। मेरे बाद उस परिवार में क्या विक्षोभ आया होगा मुझे नहीं पता लेकिन आज इंटरनेट ने जो "पारम्परिक-पतन" पैदा किया है वो देश भर में फैशन और खुलेपन से ऊपर उठ कर यौन-उत्कँठाओं का ज्वारभाटा ले आया है।
आज पुरुषों से समानता का नारा लगाते लगाते स्त्री-जात ने गालियाँ देना, नशा करना, शौकिया अलग अलग पुरुषों से शारीरिक सम्बन्ध बनाना, क्लब में देर रात पुरुष मित्रों से गलबंहिया डाले चूमना चाटना और असामान्य हरकतों वाली वीडियो बना कर इंस्टा और रील्स पर अपलोड करने तक उतारू हो चुकी हैँ। क्या यही आज़ादी उनको पुरुषों के समकक्ष खड़ी करती है।
सब कुछ यहीं तक सीमित होता तो ये परिवारों का आंतरिक मामला कहलाता, लेकिन जब ये रोग सामाजिक अपराध की श्रेणी में आने लगे तो इसकी गंभीरता को संकेत देने लगते हैँ।
जिस देश में स्त्री को देवी का स्वरुप माना जाता हो वहाँ उनका नग्न नृत्य असमंजस में तो डाल ही देता है, जिस देश में उनको अबला मान कर तमाम अधिकार और कानूनी सहूलियत दिए गए हों वहाँ जब उन कानूनों और अधिकारों को ढाल बनाकर पुरुषों और परिवारों का दमन शुरू हो जाये तो ये सब आने वाले समय में किसी भीषण परिणाम की ओर इशारा करने लगते हैँ।
अब इसकी गहराई को समझने के लिए जब मैंने उनके मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की तो उनकी जुबानी जो सुनी वो अप्रत्याशित था। अपने वक्ष-स्थल और कटिभाग की वीडियो से मशहूर हुई टिकटॉकर अवनी बताती हैँ कि समाज में ऐसे वीडियो बहुत जल्दी प्रसिद्ध होते हैँ, अगर ये वाकई बुरा है तो देखने वाले क्यों यही ढूंढ़ते हैँ ?
वहीँ अल्ट बालाजी के वेब सीरीज "गन्दी बात" से चर्चा में आईं अन्वेषी जैन के सामान्य से बड़े वक्ष भाग जिनको उत्तेजक रूप से प्रस्तुत किया गया, उनके प्रसिद्धि की वजह बन गई। और अब स्त्रियाँ अपने अंगों के प्रदर्शन से और गंदे, वर्जित शब्दों से बने वीडियो में अपने को प्रसिद्ध करने का रास्ता खोजने निकल पड़ी हैँ।

             

अब किशोर युवतियों की रोल-मॉडल सनी लियॉन और मियां खलीफा बनती जा रहीं हैँ। अपने पिता को ये बताने वाली बेटियांँ कि डेन्नी डी और जोनस बहुत पॉपुलर पोर्नस्टार हैँ, पापा की वो परियाँ हैँ जिनकी उड़ान खुद पापा भी अब डायरेक्ट किसी दिन ऑनलाइन ही समझ पाएंगे।_

गाली-गलोच से यूट्यूबर लड़कियों को रोस्ट करने वाली लड़कियों का भी अपना अलग बाज़ार सजा हुआ है।
इनका असर देखिए, लड़कियों की ये उच्चश्रृंखलता सामाजिक रूप से एक असाध्य रोग का रूप लेता जा रहा है। जिसकी जद में हर पांचवा परिवार बन रहा है।

लगभग रोज फैमिली कोर्ट में लाखों निर्दोष लोगों पर संगीन धाराओं की गाज सिर्फ इसलिए गिरती है क्योंकि मैडम को मज़ा चखाने का हुनर भी अब समझ आ गया है।_

लखनऊ की चांटेबाज़ कथित अभिनेत्री का मामला तो इसका एक पक्का उदाहरण बन चुका है।
मुझसे एक कॉउंसलिंग में जब लड़की ने बताया की अपने बॉस अमुक व्यक्ति पर उन्होंने छह माह से दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया तो मैंने उनसे पूछा कि ये प्रकरण उनको पांच माह से दुष्कर्म क्यों नहीं महसूस हुआ, अचानक से छाँठवे महीने में मैडम को लगने लगा कि अभी तलक वो दुष्कर्म की शिकार हो रही थीं..? तो वो इसको फ़िजूल के तर्कों से ढंकने की कोशिश करने लगीं, जबकि मामला कहीं ना कहीं स्वार्थ-सिद्धि और सशर्त अनुपालन के बीच सफर चिन्हित करता है।
मैं हर ऐसे मामले में इन्ही को दोषी नहीं मानता क्योंकि अपवाद हर जगह होते हैँ लेकिन बहुतायत से शातिर स्त्रियाँ अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिए किसी भी स्तर पर जाने को तैयार हैँ।
अब संगीन आरोप का प्रयोग सिर्फ लोगों को ब्लैकमेल करने, धन उगाही करने, बदनाम करने और बदले की भावना से किया जाने लगा है।
खैर यहाँ पड़ताल स्त्री के आजाद हुए जीवनशैली के परिणामों की हो रही है और वो आजकल सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है। सिनेमा में वयस्क हेतु जो वीडियो पहले किशोर और बच्चों की पहुँच से थोड़ा दूर हुआ करते थे अब OTT चैनल्स और वेब सीरीज के निर्बाध जरिये से बहुत ही आसान हो चुकी है, ऊपर से दुर्भाग्य देखिए कि इन फ़िल्मों की कहानियाँ, पारिवारिक मूल्यों को तोड़ती मरोड़ती, सामाजिक रीतियों को बेड़िया बताती, धार्मिक विषयों का मज़ाक बनाती, भारतीयता और हिंदी को पिछड़ा हुआ इंगित करती हुई ही रची जा रही हैँ। 
इस पर कोई सामाजिक और राजकीय प्रतिबन्ध अभी तक तय नहीं हो पा रहा है।
मेरा व्यक्तिगत नज़रिया है कि जो तंत्र स्वतः संज्ञान लेकर राज कुंद्रा और गहना वशिष्ठ पर कार्यवाही कर सकती है उसको एकता कपूर (यौन कुंठित विषयों वाली फ़िल्मों की प्रमुख निर्मात्री) पर कोई कार्यवाही करने में क्या दिक्कत आन पड़ती है कि लाख आपतियों के बावजूद वो इतना असहाय हो जाते हैँ। अब जब इन पर अंकुश लगाने में तंत्र इतना असक्षम है तो ऐसे में प्रतिव्यक्ति का ये नैतिक दायित्व बनता है कि वो स्वतः अपने परिवार के साथ साथ रिश्तेदारों, पड़ोसियों को ऐसे सिनेमाई और इंटरनेट जनित दुःप्रचलन के खिलाफ जागरूक करके इसका विरोध प्रकट करें। जिस देश में स्त्री को शक्ति और पवित्रता का प्रतीक माना गया हो वहाँ उनका वास्तविक पहचान न विकृत होने पाए। वीडियो और सिनेमा पर किसी भी प्लेटफॉर्म पर एक निश्चित प्रतिबन्ध निर्धारित किये जाएं। स्त्री को अधिकार देने के साथ साथ उनके परिणामों और दूरगामी परिस्थितियों के प्रति भी जागरूक किया जाये। पैसे के साथ साथ परंपराओं और सामाजिक बंधनों का मूल्य भी समझायें, नग्नता के प्रति उनका आकर्षण ना बढ़े ऐसा सामाजिक प्रभाव दर्शाएं।
किशोरावस्था एक बहुत ही नाजुक पड़ाव होता है, जहाँ उनका अधिगमन और जिज्ञासा प्रत्येक दिशा में सामानांतर चलने लगता है, और आजकल जब इंटरनेट ही शिक्षा का मुख्य आधार बन चुका है तो किशोरवय श्रृंखला को बहुत सचेत होकर सँभालने की आवश्यकता है, इसको प्रमुखता से सरकार और समाज को ध्यान देना होगा वरना इसका परिणाम बहुत ही भयावह हो सकता है। क्योंकि उच्च शिक्षा का मतलब अपनी संस्कृति से विमुख हो जाना नहीं होता, हमें अपने संस्कृति की वृहदता को भी परिभाषित करना होगा और विकृत प्रकार के सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म को प्रतिबंधित करना होगा। न्यायालयों में लंबित तमाम बनावटी और साजिशन रचे गए मुक़दमों के सापेक्ष अब इनका वास्तविक मूल्यांकन भी प्राथमिक रूप से किया जाना चाहिए, झूठे आरोपों के लिए दोषी पाए जाने पर समानता के अधिकार के लिए विद्रोही हो चुकी स्त्री समाज को भी उतनी ही जटिलता से दण्डित किया जाना तय करना चाहिए। ताकि सामाजिकता की वास्तविक पहचान न खोने पाए।

राजेश्वर पाण्डेय 'राज'
(एम.ए. मनोविज्ञान) लखनऊ