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आपत्ति काल में ही धीरज , धर्म , मित्र और स्त्री की पहचान होती है : राघवाचार्य जी



सत्यबन्धु भारत

 असोहा उन्नाव। स्थित चल रही नव दिवसीय रामकथा में प्रयाग से आए राघवाचार्य ने कहा कि भूमि परत भा ढा भर पानी आर्ताथ  जिस प्रकार आकाश से पानी की स्वच्छ एवम् निर्मल बूंदे जमीन पर गिरती है परन्तु धरती पर पड़ते ही कीचड़ युक्त हो जाती है ,ठीक उसी प्रकार मनुष्य जब धरा पर आता है तो माया अपने आगोश में ले लेती है परन्तु सिमट सिमट जल भरही तलावा अर्थात कीचड़ युक्त जल जब एक जगह एकत्रित हो जाता तो वो धीरे धीरे निर्मल एवम् स्वच्छ हो जाता है ठीक उसी प्रकार मनुष्य धरती पर आया तो जरूर है ,माया से ग्रसित भी है ,परंतु भागवत रूपी कथा एवम् सत्संग के प्रभाव से मनुष्य परमात्मा के श्री चरणों की तरफ आस्था से प्रभु को भजता है तो माया भी उस व्यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ा पाती है और वो प्रभु मे लीन हो जाता है । उन्हों ने कहा कि मन ही मोह का कारण होता है ,चंचल चलायमान रहता है इस लिए मन को वश में रखना चाहिए । कार्यक्रम के दौरान  जरदन शुक्ल , विकास शुक्ल , प्रखर त्रिपाठी , आकाश शुक्ला , सुनील रावत , दीपक कश्यप , शारदा जयसवाल , अमरनाथ गुप्ता , अनुज शुक्ल सहित सैकड़ों क्षेत्रवासी उपस्थित रहे ।