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मां प्रथम गुरू है, जीवन के हर मोड पर मां ही सच्ची शिक्षक बनकर सदा साथ खडी रहती है।

                                                                 


मां प्रथम गुरू है, जीवन के हर मोड पर मां ही सच्ची शिक्षक बनकर सदा साथ खडी रहती है।

इसलिए शिक्षक दिवस हो या गुरू पूर्णिमा मैं अपनी मां के चरणों का सर्वप्रथम वंदन करती हूं।

मां जो जीवनदायिनी है उसकी उपेक्षा करना सबसे बडा अपराध है।उसके दिए ज्ञान से ही कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की प्रथम पाठशाला में उत्तीर्ण होता है।

परन्तु कुछ लोग मां को उन पलों में त्याग देते हैं जिन पलों में उसको अपने बच्चों की सबसे अधिक जरूरत होती है।

एक घटना का जिक्र करना चाहती हूं।एक सज्जन की मां बिस्तर पर हैं।उम्र है अस्सी साल।घर में सारी सुविधाएं हैं।एक नौकर है।पन्द्रह हजार रूपये पाता है।बुजुर्ग माता जी की सेवा करता है।बेटा-बहू,नाती-पोते सब बाहर रहते हैं।बाहर मतलब भारत के ही दूसरे शहर में।

कभी-कभार आते हैं।एकलौता लडका,मां रोज बेटे की फोटो देखकर संतोष करती हैं।स्नेह के दो बोल को तरसती हैं।नाती को देखने को तरसती हैं।

मां ने शायद अपने बेटे को कभी बीमार अवस्था में अपने सीने से अलग ना किया होगा।

लेकिन बेटे के पास समय नहीं है।उसको बहुत पैसा कमाना है।बेटे की शादी मे बुजुर्ग मां को नही ले गये।डिजाइनर शादी में बूढी मां पैबंद जो लगतीं!

मेरी बात कड़वी लग सकती है लेकिन हर शहर मे ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे जो आज की सच्चाई है।

दिखावे ने लोगों को इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि बुढे माता पिता उनको बोझ लगने लगे हैं।

हमें अपना बचपन याद करना चाहिए जब हमें हर परिस्थिति में माता पिता अपने साथ रखते थे।कभी भी अकेला नही छोडते थे।लेकिन बच्चे मां बाप को बुजुर्ग अवस्था में अकेला तन्हा छोड देते हैं। वो किसी से बात करने को तरसते हैं। 

उनको स्नेह चाहिए, दो बोल मीठे प्रेम के चाहिए। आखिर वृद्धाश्रम की परिकल्पना का क्या उद्देश्य है? चाइल्ड केयर, डे केयर बने हैं उन बच्चों के लिए जिनकी माताएं काम पर जाती हैं।

क्या आजतक कोई संतानाश्रम बना है?

नहीं न!क्योंकि मा बाप बच्चों को बोझ नहीं मानते।

इस शिक्षकदिवस पर यही प्रार्थना है कि प्रथम गुरू मां का सम्मान हो और उसकी आंखों से अश्रु ना बहे।

-ऋतुजा सिंह बघेल 

लखनऊ