![]() |
| पंकज कुमार मिश्रा एडिटोरियल कॉलमिस्ट शिक्षक एवं पत्रकार केराकत जौनपुर । |
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे की खबर मात्र से ही भारतीय मीडिया और भारतीय सेक्युलर हुक्मरान चिंतित हो रहे हैं। भारत में बढ़ते रोहिंग्याओं के बीच अब अफगानी भी भारत में पलायित होंगे इससे सबको चिंतित होना लाजमी भी है ।तालिबान का मॉड ऑफ़ ऑपरेशन आज ऐसा है तो जब यह जंगली रहे होंगे तब कैसा रहता होगा ? दर्जनो वीडियो वाइरल हो रहे है जिसमें अफ़ग़ानी पुरुष अपने देश से भाग रहे है बीबी बाल बच्चे छोड़ कर जबकि उन्हें पता है महिलाओं और बच्चों बच्चियों का यह हैवान क्या करेंगे ? फिर भी किसी किस्म का प्रतिरोध क्यों नहीं किया, जबकि वहां तो हथियार भी सबके पास होते हैं। जिसके सामने प्रताड़ना और मृत्यु निश्चित है, यह इन तस्वीरों में देख कर समझा जा सकता है जिसमें सैकड़ों लोग रनवे पर उड़ते हवाई जहाज से लटक गए जिसमें से गिर कर मर रहे है, आख़िरकार यह मरने वाले लोगों तक ने भी आखिरकार हथियार क्यों नहीं उठाये, बल्कि बगैर किसी विरोध के अपना अंधेरा भविष्य चुन लिया। मानव इतिहास में बहुत कम घटनाएं ऐसी मिलेगी जब पूरी प्रजाति आक्रांता के विरोध में खड़ी हो जाए। अक्सर सेनाओं की हार जीत के बाद जनता नए शासक को स्वीकार कर लेती है, और उनके हिसाब से जीने लगती है। सच्चाई ये भी है कि सामान्य नागरिकों का कोई समूह कितना ही जोशीला क्यों ना हो, प्रशिक्षित मिलिशिया या सैन्य दल से नहीं लड़ सकता। हथियार होने पर भी अनुभव के अभाव में आमने सामने की लड़ाई में टिकना बहुत कठिन होता है। परंतु फिर भी हर समाज में कुछ न कुछ लोग निकल आते हैं, जिनमें लोहा होता है, वे ताकतवर का प्रतिरोध करते हैं। जैसा इस देश में हज़ारों वर्षों तक राजपूतों ने किया उनके साथ अन्य वर्ग जाती धर्म से कुछ लोग ही होते थे अमूमन उनका साथ कोई नही देता, वे भी नहीं जो खुद अत्याचार से पीड़ित हैं, जिनका सब कुछ आक्रांता ने छीन लिया, वे सिर्फ जान बचाने के लिए चुप रहते हैं, भले ही उनके लिए लड़ने वाला मारा जाए। हिंदुस्तान में ही कश्मीरी पंडितों का प्रसंग देखें तो उन्हें भी भागना पड़ा, उनका दोष नहीं है, क्योंकि वे लड़ने की स्थिति में नहीं थे, लेकिन उसी जम्मू में डोगरा राजपूत अपने शान और शौक़त से कैसे रह रहे थे और आज भी रह रहे है ? क्षत्रियों ने आठवीं शताब्दी से लेकर 17 वीं शताब्दी तक ,इन जैसे हजारों हमलावरों की भीड़ से देश के लोगों को लगभग 1000 वर्षों तक कैसे बचाए रखा होगा? अगर भारत के समस्त लोग इस बात पर चिंतन करें । तो निश्चित ही क्षत्रियों की वीरता और बलिदान को भुला नहीं पाएंगे जो तथाकथित इतिहासकार और क्षत्रियों से द्वेष रखने वाले तथाकथित लेखक यह कहते हैं कि केवल 2000 सैनिकों ने भारत को गुलाम बना लिया तो अफगानिस्तान के तालिबान के सैनिकों की भीड़ को देखें। तो भारत के पूर्वाग्रही और तथाकथित इतिहासकारों के झूठ की पोल खुल जाएगी कि भारत में केवल 2000 सैनिक आते थे और क्षत्रिय राजाओं को हरा देते थे। वैसे अभी बहुत कुछ बाकी है देखने को, देखते रहिये ! यह किसी की विजय नहीं है बल्कि धरा पर किसी के विनाश व सर्वनाश की सदियों पुरानी प्रथा है। जब इनकी लड़ाई किसी से नहीं होती तो इसकी लड़ाई होती है कि कौन सबसे शुद्ध मुसलमान है। 13वी सदी के बाद तलवार के बल पर मजहब विस्तार बंद हो गया। एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा। ये कबीलाई लड़ाई कोई अफगानिस्तान कि बात नहीं है, इसमें तो पूरा मध्य एशिया खंडहर हो गया है। हजारों साल से तो कट कट के मर ही रहे है।अफगानिस्तान इस्लामिक मुल्क ही था। असरफ गनी मुस्लिम ही थे। तालिबान को पाक मुस्लिम चाहिये। बगदादी को खिलाफत से पाक इस्लामिक साम्राज्य चाहिये जंहा गोला बारूद हथियार है और 6 वर्ष की मासूम से लेकर 90 वर्ष की खातुनें खुराक हैं। 8 लाख सेना, 25 साल से तैनात है। कभी उसका खर्च जोड़िये, विदेशी मुद्रा भंडार से अधिक होगा। भारत जैसे देश के लिये यह कितना बोझ है। जो अपनी गरीब जनता के लिये लगाता वह इन जिहादियों से लड़ने में लगा रहा है। ये बड़े मासूम है। इनको अमेरिका, यहूदी भड़काते है और ये भड़क जाते हैं और आपस मे ही लड़ मरते हैं। गजनी, बाबर , मीर कासिम को अमेरिका ने भेजा था? जो चार जिहाद क्रुसेड हुये वह क्या अमेरिका किया था ? भारत का विभाजन क्या अमेरिका ने किया था ? कश्मीर क्या गरीब था जो 25 साल से खून खराबा मचा है ? इनका दुर्भाग्य देखिये। हलाकू खान के बगदाद हमले के बाद 80 दशक से अब तक सबसे अधिक मुस्लिम मारे गये और खुद मुस्लिमों ने मारा। उसका जश्न मना रहे है।आज तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन मुस्लिम दुनिया के नेता बना है। 5 लाख कुर्दों को मार दिया। वह भी तो मुस्लिम ही थे। अगर कोई यह सोचता है कि उनको हत्या , बलात्कार पर आपकी आलोचना से फर्क पड़ता है तो फिर आप रेगिस्तानी शुतुरमुर्ग हैं। लाखों अफगानी को मारने के बाद वह भारत में ही बैठकर मंद मंद मुस्कुरा रहे है। हमारी आलोचना इनके हित मे है। लेकिन इतिहास रहा है कि इनके हित की जो बात किया वही दुश्मन बन गया।

