
सत्यबन्धु भारत।सन्दीप कुमार
सबायजपुर,हरदोई। छह साल से बिस्तर पर पड़े रहने के कारण बेड सोल की बीमारी से ग्रसित अरविंद राजपूत को अब इलाज की सुविधा मिल सकेगी। आत्मसंतुष्टि मिशन संस्था के संरक्षक और जनपद के प्रख्यात समाजसेवी राजवर्धन सिंह राजू भइया ने शुक्रवार को उनके इलाज की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली है। छह साल पहले पेड़ से गिरने के कारण अरविंद का पैर टूट गया था। माली हालत खराब होने के कारण वह अपना इलाज नहीं करा सका, इस वजह से उसे बेड सोल की बीमारी हो गई।
गौरतलब है कि सवायजपुर विधानसभा के अंतर्गत आने वाले विकासखंड हरपालपुर के ग्रामसभा श्यामपुर पंजा निवासी अरविंद राजपूत छह साल पहले पेड़ से गिर गए थे। इस दौरान उनके पैर टूट गये थे। माली हालत काफी दयनीय होने के कारण वह अपना इलाज नहीं करवा सके। परिणाम यह निकला कि वह आज तक अपने पैरों से चलने को तरस रहे हैं। चारपाई पर पड़े-पड़े उनको बेड सोल की बीमारी हो गई है। इलाज कराने में अपनी थोड़ी बहुत खेती भी बेच चुके हैं। अब उनके सामने दर-दर भटकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। उनके परिवार ने जनपद के हर उस दरवाजे पर दस्तक दी, जहां से उन्हें कोई उम्मीद की लौ दिख रही थी। अफसोस कि किसी भी दरवाजे से उनको कोई भी मदद नहीं मिल पाई। इस दौरान कहीं से उन्हें मिशन आत्मसंतुष्टि के बारे में जानकारी मिली। इस पर उन्होंने संस्था के संरक्षक और जनपद के प्रख्यात समाजसेवी राजवर्धन सिंह राजू से मदद करने की गुहार लगाई। संस्था ने उनको इलाज कराने का भरोसा और तत्काल आर्थिक मदद दी । इस तरह छह साल से अपाहिज की जिंदगी जी रहे अरविंद को भी अब अपने पैरों से दोबारा चल पाने की आस बंध गई है।
आत्मसंतुष्टि संस्था के संरक्षक राजवर्धन सिंह राजू ने बताया कि अरविंद राजपूत ने मदद मांगी थी। संस्था की ओर से उसके इलाज का पूरा खर्च उठाया जाएगा। इसके साथ ही परिवार के लिए न्यूनतम जीवन स्तर की चीजें भी मुहैया कराई जाती रहेंगी। उधर, पीड़ित ग्रामीण अरविंद राजपूत ने बताया कि उन्हें तो अब किसी से उम्मीद की आस ही नहीं बची थी। करीब चार साल पहले उन्होंने स्थानीय विधायक से अपने लिए मदद मांगी थी। चुनाव जीतने के बाद से उन्होंने कभी उनकी सुधि नहीं ली है। अरविंद ने बताया कि मिशन आत्मसंतुष्टि संस्था के संरक्षक राजवर्धन सिंह भइया का आभार व्यक्त करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं, वह हमारे परिवार के लिए मसीहा बनकर आए हैं। हमारे अंदर भी अब जीने की उम्मीद जग गई है, शायद अब मैं भी जल्दी ही अपने पैरों पर चल सकूं।
