लेटेस्ट खेल समाचार कोरोना देश राज्य क्राइम बिजनेस दुनिया नॉलेज ऑटो दुर्घटना ट्रेंडिंग लाइफ स्टाइल धर्म करियर टेक मनोरंजन

ग्रामीणों को छल रहा अधूरा पड़ा सामुदायिक शौचालय

 हरदोई जिले में जिम्मेदारों की बंदरबांट नीति के चलते कागजों में पूरे, जमीन पर अधूरे पड़े सामुदायिक शौचालय ।



सत्यबन्धु भारत। सन्दीप कुमार

हरदोई। प्रत्येक ग्राम पंचायत में सामुदायिक शौचालय का निर्माण हो। जिससे किसी भी परिवार को शौच के लिए खुले में न जाना पड़े। शासन की प्राथमिकता में शामिल इस योजना के तहत निर्मित कराए गए शौचालयों के नाम पर जनपद में प्रधान,सचिव से लेकर ऊपर बैठे अधिकारियों द्वारा खुलकर मनमानी की गई। परिणाम भले ही शासन स्तर से योजना के तहत भेजे गए लाखों रुपये खर्च कर दिए जा रहे हों लेकिन स्वच्छता आती नहीं दिख रही है। इसका स्पष्ट उदाहरण देखा जा सकता है टोंडरपुर  ब्लाक क्षेत्र के हूंसेपुर करमाया गांव में बने सामुदायिक शौचालय में। दीवाल खड़ी कर बाहर रंग-रोगन करके चमका दिया गया लेकिन अंदर काम अधूरा पड़ा है। इससे वह ग्रामीणों के लिए शोपीस बनकर केवल छलता नजर आ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार गांव में बना सामुदायिक शौंचालय सिर्फ दिखावा मात्र है,इसका ग्रामीणों को एक बार भी लाभ नही मिला। 

हूंसेपुर करमाया में बने सामुदायिक शौंचालय के गड्ढे भी आधे-अधूरे पड़े हैं, पानी की टंकी प्रधान द्वारा उखाड़कर अपने घर रख ली गई, पानी की कोई व्यवस्था नही। यहाँ तक की ग्रामीणों के लिए बनाए गए सामुदायिक शौंचालय को बंद करके चाभी भी ग्राम विकास अधिकारी धीरज पांडेय ने अपने पास रख ली। 



ब्लॉक टोंड रपुर के हूंसेपुर करमाया गांव में सामुदायिक शौचालय का निर्माण करीब एक वर्ष पहले शुरू कराया गया। निर्माण के नाम पर जमकर की गई धांधली का हाल यह रहा है कि कागजों में शौंचालय पूरी तरह बनकर तैयार हो गया, ग्रामीण शौंच के लिए भी जाने लगे पर हकीकत इसके बिल्कुल उल्टी। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के नाम पर लाखों रुपये का बंदरबांट किया जा चुका है। जबकि निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। शौचालय के दरवाजे पर सेक्रेटरी ने ताला डाल दिया है जिससे खुले में खेतों का सहारा लेने को विवश होना पड़ता हैं। आरोप है कि अवगत कराने के बाद भी विभागीय मिलीभगत के चलते अधिकारी मौन हैं। ब्लॉक के लगभग 80% सामुदायिक शौचालयों का यही हाल है। ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की  जड़ बहुत गहरी है। यहाँ तक की ऊपर तक बैठे अधिकारियों तक बंदरबांट की बात से साफ इंकार नही किया जा सकता।

इसके अतिरिक्त इन्ही बन्द पड़े सामुदायिक शौचालयों में 06 हजार रुपये वेतन पर केयर टेकर नियुक्तियां भी हो चुकी हैं आखिर जब शौंचालय कभी ग्रामीणों के लिए खुला ही नही तो साफ-सफाई के नाम पर 6000 रुपये आखिर किसके पास जा रहे है यह सोचनीय प्रश्न है।