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बिजली विभाग की बेसिल कम्पनी व सुपरवाइजर को बदनाम कर शिकायतकर्ता ने वापस ली शिकायत



झूठे शिकायतकर्तओं पर कोई कार्यवाही न होने से हरदोई में बढ़ रहा झूठी शिकायतों का चलन


सत्यबन्धु भारत

सीवी आज़ाद


हरदोई। अभी तक अदालतों में झूठी गवाही देने के मामले प्रकाश आते थे लेकिन अब उच्चाधिकारियों के पास झूठी शिकायत करने के मामले भी तेजी से प्रकाश में आ रहे हैं,हालांकि कानून में झूठी शिकायत करने की बात सिद्ध हो जाने पर सज़ा का प्राविधान है लेकिन ज्यादातर मामलों में झूठी शिकायत करने वालो पर कोई कार्यवाही न हो पाने के चलते किसी की सामाजिक,प्रतिष्ठा व स्वच्छ छवि को धूमिल करने, अनावश्यक रूप से परेशान करने या अपने किसी खास मकसद को पूर्ण करने के उद्देश्य से हरदोई में भी झूठी शिकायतों के मामले प्रकाश में आने लगे है। इसी तरह का एक मामला बिजली विभाग में कार्यरत बेसिल कम्पनी का सामने आया। जहाँ थाना शाहाबाद के बड़ेहा रसूलपुर गांव निवासी कुलदीप कुमार द्वारा कुछ दिन पूर्व इस कम्पनी में बड़े पैमाने पर भृष्टाचार का आरोप लगाते हुए उच्चाधिकारियों के पास लिखित शिकायत दर्ज कराई गयी थी,जिसमे कहा गया था कि उक्त कम्पनी के सुपरवाइजर विनय उर्फ रमलू शुक्ला द्वारा कई संविदाकर्मियों का काम व उपस्थिति सिर्फ कागजों पर दर्शाकर सरकार को प्रति माह कई लाख रुपये का चूना लगाया जा रहा है।यह खबर सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हुई थी। मिली जानकारी के अनुसार जब इस बात की जानकारी बेसिल कम्पनी के हरदोई के सुपरवाइजर विनय उर्फ रमलू शुक्ला को हुई तो उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए बिना किसी कारण या सबूत के स्वयं व कम्पनी के विरुद्ध दुष्प्रचार के उद्देश्य से की गई झूठी शिकायत के लिए मानहानि का दावा करने व मीडिया में अपना पक्ष रखने की कवायद शुरू की,जब इस बात की जानकारी शिकायतकर्ता कुलदीप कुमार को हुई तो उसने फौरन उच्चाधिकारियों को सिर्फ मौखिक तथ्यों के आधार पर झूठी शिकायत व सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए शपथ पत्र प्रस्तुत कर अपनी शिकायत वापस ले ली। अब सवाल यह उठता है कि जब उसके पास कोई सबूत ही नही था तो आखिर उसने किस उद्देश्यपूर्ति के लिए शिकायत की थी और क्या उसके शिकायत वापस मात्र लेने से बेसिल कम्पनी व उसके कर्मियों की धूमिल सामाजिक छवि वापस आ जाएगी? क्या इस कम्पनी के कर्मियों द्वारा झूठे शिकायतकर्ता पर किसी कार्यवाही का कोई दावा किया जाएगा? ऐसे कुछ सवालों का जवाब खबर लिखे जाने तक मिलना बाकी था।