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सरकारी मशीनरी की छांव में अव्यवस्थाओं के घाव जगत की माता कही जाने बाली गाय की अंतर्वेदना समझने बाला कोई नही

                                                              


सत्यबन्धु भारत

सन्दीप कुमार

पिहानी, हरदोई। मैं गाय हूं, संपूर्ण जगत की माता कही जाती हूं पर मेरी अंर्तवेदना अब कोई समझने वाला नहीं है. पहले मेरी पूजा की जाती थी और घर के खूंटे से बांधकर चारा पानी खिलाया जाता था, लेकिन अब मैं उपेक्षित हो चुकी हैं और पशुपालकों, किसानों ने मुझे खूंटे से छोड़ दिया है। अब मैं अन्ना के नाम से जानी जाती हूं और गोशाला या सड़क के किनारे ही मेरी पनाहगाह है। सरकारी तंत्र ने भी मेरी व्यथा को सुना नहीं है। सिर्फ कागजों में मुझे भरपेट भोजन देने की बात की जाती है। अब तो मेरा पेट भी स्याह हो रहा है।

पिहानी क्षेत्र  के किसानों की जुबान पर सिर्फ अन्ना..अन्ना..अन्ना.. जानवरों की ही बात रहती है। जबकि जो अन्ना जानवर घूम रहे हैं वह कहीं बाहर से नहीं आए हैं बल्कि क्षेत्र के पशुपालकों व किसानों द्वारा दूध न देने के बाद छोड़ दिए गए हैं। अगर यह जानवर अपनी भूख मिटाने के लिए उन्हीं किसानों के खेतों में जाते हैं तो किसान फसल बर्बादी का रोना रोने लगता है और सरकार से मुआवजे की मांग करता है। जबकि हकीकत में वह जानवर उन्हीं का.. जिसे उन्होंने अब मरने के लिए छोड़ दिया। सरकार ने इन जानवरों के लिए प्रयास करना शुरू किया तो गोशालाएं बनवा दीं लेकिन फिर खेल शुरू हुआ जेबें भरने का..। इन जानवरों के लिए चारे पानी का.. पैसा आया तो जिम्मेदारों ने उसका बंदरबांट किया और बाद में भूख प्यास से बेहाल इन जानवरों को उसी गोशाला में इस तरह बंद कर दिया कि वह किसी भी मौसम में वहीं दम तोड़ते नजर आने लगे।


करोड़ों खर्च के बाद भी खेतों में क्यों घुसते जानवर...

प्रदेश की सरकार ने जब अन्ना जानवरों से परेशान किसानों की गूंज सुनी तो करोड़ों रुपये का बजट पास करते हुए इन जानवरों के लिए गोशालाएं बनवानी शुरू कर दीं लेकिन प्रधान, बीडीओ, सचिव, चेयरमेन से साथ कई जिम्मेदारों ने इसमें गंभीरता नहीं दिखाई और बजट तो खर्च कर लिया गया लेकिन यह जानवर आज भी गोशालाओं व सड़कों पर अपनी भूख प्यास मिटाने के भटक रहे है।

स्थायी व अस्थायी गोशालाएं भी बनी शो पीस...

जहां भारी भरकम बजट दिया गया तो वहां स्थायी गोशालाएं बनवा दी गईं और उनमें संयमित जानवरों को रखा गया लेकिन जहां कम बजट मिला वहां सिर्फ तार फेंसिग करके गोशाला बनवा दी गई और उनमें तादाद से अधिक जानवरों को भर दिया गया जिससे सर्दी के मौसम में रोजाना जानवरों की मौत हो जाती है। सिर्फ नाम के लिए ही गोशालाएं हैं और व्यवस्थाएं उनमें कहीं नजर नहीं आती है। बीते दो बर्षो में सबसे सौ अन्ना जानवरों की मौत सड़क हादसों व  चारा न मिलने और सर्दी के कारण पता नही कितने मर चुके हैं। मजे की बात तो यह है कि सरकारी आंकड़ों में पशुओं की मौत न के बराबर है। विभाग के पास मरने वाले पशुओं का कोई आंकड़ा नही है।