
लखनऊ
प्रोग्रेसिव लिटरेरी और कल्चरल समिति के तत्वावधान में दिनांक 5 जून को एक वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम में राज्य विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य हिंदी, डॉ. अलका मिश्रा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना जरूरी है ताकि मानव जाति के लिए ऑक्सीजन प्राप्त हो सके और जैव विविधता के कारण ही प्रकृति में संतुलन बना रहे।
प्रकृति जब भी संतुलित होगी समाज उतना ही सुदृढ़ होगा।
समाज में मनुष्य के अलावा सभी जीवधारी पेड़-पौधे उतने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ अलका मिश्रा ने कहा कि भारत में जल,थल,नभ को पर्यावरण प्रदूषण से बचाना होगा और उसके लिए जरूरी है कि समाज में पर्यावरण को सुरक्षित रखने की जागरूकता अभियान चलाया जाए।
प्रदूषण मुक्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति जब तैयार हो जाएगा तो निश्चित तौर पर प्रकृति में संतुलन की स्थिति बनी रहेगी और आपदा प्रबंधन की घटनाएं नहीं होंगी।
जिसमें समिति की संयोजक डॉ शमेनाज़ ने कहा की हमें एक अच्छे नागरिक होने के नाते पर्यावरण को बचाना चाहिए। उन्होंने अंतराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के इतिहास और उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला ।
इसके उपरान्त कार्यक्रम की मुख्य वक्ता डाॅ अलका मिश्रा ने भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन पर अपना वक्तव्य दिया।
कार्यक्रम में के. राधाकृष्णन ने अपनी कविता 'आई ऍम एं एंग्री बर्ड' का पाठ किया।
डॉ शमेनाज़ ने अपने वक्तव्य मे कहा की जिस तरह अनेक हिंदी के कवियों ने प्रकृति का चित्रण अपनी रचनाओं मे किया हैं उसी तरह से अंग्रेजी साहित्य मे भी बहुत से कवियों ने प्रकृति का चित्रण अपनी रचनाओं किया हैं इसमें उनीसवी शताब्दी के रोमांटिक कवि अग्रणी रहे हैं और इसमें सबसे ऊपर विलियम वर्ड्सवर्थ का नाम आता हैं,जिन्होंने अंग्रेजी साहित्य को नया आयाम दिया। इन्होने प्रकृति की छोटी -छोटी चीज़ों से प्रेरणा ली और उनका अपनी कबिताओं मे चित्रण किया।
डॉ शमेनाज़ ने वर्ड्सवर्थ की 'सॉलिट्री रीपर' का पाठ किया और उसका उल्लेख किया। उन्होंने प्लास्टिक का इस्तेमाल ना करने का निवेदन किया और ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाने का अनुरोध किया ।
डॉ अनुपमा शर्मा ने अपने वक्तव्य मे वर्ड्सवर्थ को दर्शानिक बताया और कहा की उन्हें 'हाई प्रीस्ट ऑफ़ नेचर' कहा जाता हैं। वर्ड्सवर्थ का जो प्रकृति को देखने का नज़रिया था उसे 4 चरण मे बांटा जाता हैं। उन्होंने चारो चरण को विस्तार मे बताया। उन्होंने कहा की विकसित होने के लालच मे हम प्रकृति को भूलते गए। उन्होंने वर्ड्सवर्थ की कविता 'दा वर्ल्ड इस टू मच विथ अस' का उदाहरण देते हुए कहा की यह कविता सादहरण किंतो दर्शानिक हैं। कवि ने इसमें कहा हैं की हम भौतिकवाद के पीछे भाग रहे हैं, हम पैसा कमाने की होड़ मे भाग रहे हैं और सच्ची खुशी से दूर भाग रहे हैं। हम अपना समय फालतू की चीज़ों मे बर्बाद कर रहे हैं और प्रकृति से दूर जा रहे हैं। आज हमारे पास समय नहीं आसपास की खूबसूरत चीज़ों के लिए जो प्रकृति ने हमें दिया हैं।
अंत मे डॉ मनीषा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा की अगर हम पर्यावरण का संरक्षण करें तो आज जैसे कोरोना महामारी फैली हैं वह नहीं फैले। उन्होंने कहा की यह जो बेमौसम बरसात हो रही वह भी क्लाइमेट चेंज की वजह से इसका ज़िम्मेदार मनुष्य हैं। हम अपनी छोटी बड़ी ज़रूरतों के लिए प्रकृति पर निर्भर हैं पर इसके बावजूद दुनिया भर मे पर्यावरण के संरक्षण को अनदेखा किया जाता हैं। उन्होंने कहा की हमें प्रतिदिन एक नियम बनाना चाहिए की कैसे हम प्रकृति का संरक्षण कर सकते हैं।
