लेटेस्ट खेल समाचार कोरोना देश राज्य क्राइम बिजनेस दुनिया नॉलेज ऑटो दुर्घटना ट्रेंडिंग लाइफ स्टाइल धर्म करियर टेक मनोरंजन

दर्द ढूँढ़ता है एक कान जो सुन ले उसे-प्रज्ञा पांडेय की बेहतरीन कविताएं

प्रज्ञा पांडेय, कवयित्री


धरा ने देखा है 

कई सूरजों को 

ख़ाक होते

सभ्यताओं तले 

दफन सूरज की राख से 

एक नए 

सूरज को जन रही   

सभ्यताओं की धात्री - प्रज्ञा पांडे

कंक्रीट 

के 

जंगलों से

झांकती 

बीवाईयों सी दरारों

 में

पनपता है 

प्रेम

उन्हें 

भरने को 

जंगली घास 

और 

फूल बनकर - प्रज्ञा पांडे


जंगली घास सी 

जीवट औरतें 

 पानी में 

बंजर जमीन पर 

खुरदरी चट्टानों पर 

घिसे हुए पत्थरों पर 

तारकोल की सड़कों से 

झांकती दरारों में

मरू में 

कटीली झाड़ियां बनकर

पनप जाती हैं 

जी जाती हैं

अंतस में 

बहुत गहरे तक 

अपनी जड़ों को फैला 

तलाश लेती हैं प्रेम 

और जी जाती हैं - प्रज्ञा पांडे


दर्द 

ढूंढता है 

एक कान 

जो सुन ले 

उसे बस सुनना ही तो है 

उसे और अपेक्षाएं नहीं 

बस प्रकट हो जाना चाहता है 

पर जुबानों ने 

इतना शोर मचाया कि 

रास्ते बंद है 

कानों के 

सबके हिस्से में है 

अपना अपना दर्द 

जो सुना जाना बाकी है 

कह रहा है हर कोई 

बस कह रहा है 

सुनना नहीं है

फिर 

जिन संवेदना ओं को 

कान नहीं मिलते 

वह तलाशती हैं 

दूसरे रास्ते कागजों पर 

शब्दों में बिखर जाती हैं 

और कविताएं बन यह 

दर्द कालजयी हो जाते हैं

कांधे पर फरहा टांगे 

अपने चट्टान से पैरों तले 

जमीन को सहलाता जा रहा है 

फरूहे कि मुठ पर 

टंगी पड़ीं हैं कुछ जिम्मेदारियां 

साल भर की भूख मुस्कुराकर

मैले अधफटे गमछे से 

उसका पसीना पोंछ देती है

दसवीं पूरी हो गई 

अच्छे नंबरों से

अंदर सीने में 

एक युद्ध 

अनवरत चल रहा है 

हाथों में किताबे 

और गांव की दहलीज पार 

या

चावल के कलश सजे 

चौखट पर विदाई

लहराती फसलों को

भ्रम है कुछ और बढ़ने की

उसकी पथरीली सजल आंखों 

और फरूहे  की धार 

से बेखबर हैं

ये पक चुकी फसलें ...।। - प्रज्ञा पांडे

जिंदा रहने की

जद्दोजहद ने 

उसके अंदर 

कंक्रीटो की साखों पर 

घोसले बनाने की कला 

विकसित कर दी है

प्रकृति अब भी उसे 

अपने आंचल से दूर 

जाते हुए 

निःशब्द 

सूनी आंखों से ताक रही है

डरती है 

कहीं जीने की अदद़ चाह 

इंसानी फितरत 

ना पनपा दे उसमें !!! - प्रज्ञा पांडे